हिंगलाज माता मंदिर पाकिस्तान | Hinglaj Mata Mandir

हिंगलाज माता का मंदिर (Hinglaj Mata Mandir) (Balochi), जिसे हिंगुला देवी (Hingula Devi) या हिंगलाज देवी (Hinglaj Devi) या फिर नानी मंदिर के नाम से जाना जाता है, हिंगलाज में एक हिन्दुओं का मंदिर है, जो बलूचिस्तान (Balochistan) के लासबेला जिले में मकरान तट पर एक शहर है और हिंगोल राष्ट्रीय उद्यान के बीच में है।

यह मंदिर हिंदू धर्म के शक्तिवाद के 51 शक्तिपीठों में से एक है। और पाकिस्तान के दो शक्तिपीठों में से एक है, अन्य शिवहरकारे हैं। यह हिंगोल नदी के तट पर उपस्थित एक पहाड़ी गुफा में दुर्गा देवी का रूप है। जहाँ पिछले तीन दशकों में इस स्थान ने बढ़ती लोकप्रियता हासिल की है और यह पाकिस्तान के कई हिंदू समुदायों के लिए एक एकीकृत संदर्भ भी बन गया है।

हिंगलाज माता मंदिर पाकिस्तान | Hinglaj mata mandir
ImageCredit/BillmirzaatEnglishWikipedia

Hinglaj Mata Mandir Pakistan

हिंगलाज यात्रा पाकिस्तान का सबसे बड़ा हिंदू तीर्थस्थल बन गया है। वसंत के दौरान हिंगलाज मंदिर की यात्रा में करीब 250,000 से अधिक लोग हिस्सा लेते हैं।

यह तीर्थ एक छोटी सी प्राकृतिक गुफा के अंदर में है। यह एक मिट्टी की अवतार है। देवी माँ की कोई मानव निर्मित छवि नहीं है। यह एक छोटे आकार के पत्थर को हिंगलाज माता के रूप में पूजा जाता है। इस पत्थर को सिंदूर से गिला किया जाता है, जो संभवतः इस स्थान को संस्कृत नाम हिंगुला देता है, जो वर्तमान के नाम हिंगलाज का मूल है।

बलूचिस्तान में तहसील ल्यारी के दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्र में एक संकरे घाट में यह माता हिंगलाज मंदिर (Hinglaj Devi) का गुफा स्तीथ है। यह उत्तर-पश्चिम में 250 किलोमीटर (160 मील) में, अरब सागर से 12 मील (19 किमी) अंतर्देशीय में और सिंधु के मुहाने के 80 मील (130 किमी) पश्चिम में स्तीथ है। यह हिंगोल नदी के पश्चिमी तट पर मकरान रेगिस्तान में, कीर्तन पर्वत की एक श्रृंखला के अंत में स्तीथ है। यह क्षेत्र हिंगोल नेशनल पार्क के अंतर्गत आता है।

हिंगलाज तथा आसपास के अन्य पूजा स्थल हैं – गणेश देव, माता काली, ब्रह्म कुध, गुरुगोरख नाथ डौनी, तिर कुंड, रामजारोखा बेथक, गुरुनानक खारो, चंद्र गोद, अनिल कुंड पर चौरासी पर्वत, खारिरिवर और अघोर पूजा।

Hinglaj Mata Mandir in India

हिंगलाज माता मंदिर राजस्थान

माता हिंगलाज को बहुत शक्तिशाली देवी कहा जाता है, जिसे अपने सारे भक्तों की भलाई करने वाली के रूप में भी जाना जाता है। उनका हिंगलाज मुख्य मंदिर है, उनके लिए समर्पित मंदिर भारत के राज्यों गुजरात और राजस्थान में स्तीथ हैं। इस मंदिर को विशेषकर संस्कृत में हिंगुला, हिंगलाजा, हिंगलाजा और हिंगुलता के नाम से भी जाना जाता है। देवी को हिंगलाज माता (Hinglaj Mata), हिंगलाज देवी (Hinglaj Devi), हिंगुला देवी (Hinglaj Devi) (लाल देवी या हिंगुला की देवी) और कोटवी या कोट्टारी के नाम से भी जाना जाता है।

हिंगलाज माता की कथा

हिंगलाज माता की प्रमुख कथा शक्तिपीठों के निर्माण से जुडी हुई है। प्रजापति दक्ष की पुत्री सती का विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध भगवान शिव से किया गया था। दक्ष ने एक महान यज्ञ का आयोजन किया परन्तु इस यज्ञ में सती और शिव को आमंत्रित नहीं किया गया था। फिर भी बिन बुलाए, सती यज्ञ-स्थल पर आ पहुंची, जहां दक्ष ने सती को नजर-अंदाज किया और शिव को प्रसन्न किया। इस अपमान देवी सती झेल नहीं पाई, तथा सती ने अपने चक्रों को सक्रिय करते हुए, (अपने क्रोध से उत्पन्न ऊर्जा) को विसर्जित कर दिया था।

हिंगलाज माता के चमत्कार

देवी सती की मृत्यु हो गई लेकिन उनकी लाश न जली। देवी सती की मृत्यु के लिए जिम्मेदार होने के कारण से शिव ने विराभद्र रूप धारण कर दक्ष को मौत के घाट उतार दिया और उन्हें फिर जीवित कर दिया। दु:खी-त्रस्त शिव ने सती की लाश के साथ ब्रह्मांड में भटकने ​​लगे। अंत में, विष्णु भगवान ने सती के शरीर को 108 भागों में खंडित किया, जिसमें से 52 पृथ्वी पर गिरे और अन्य ब्रह्मांड के अन्य ग्रहों पर गिरे जो शक्तिपीठ, देवी का एक रूप मंदिर बना।

प्रत्येक शक्तिपीठ में भगवन शिव की पूजा भैरव के रूप में की जाती है, जो कि पीठा के संरक्षक देवी के पुरुष समकक्ष या संरक्षक माना जाता हैं। माना जाता है कि देवी सती का सिर हिंगलाज पर गिरा था।

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